यथा दुर्गाश्रितानेतान्नापहिंसन्ति शत्रवः ।
तथाऽरयो न हिसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ।।
जिस प्रकार इन (धन्व आदि) दुर्गो में रहने वाले इन (मृग आदि) को शत्रु (व्याध आदि) नहीं मार सकते हैं, उसी प्रकार दुर्ग में निवास करने वाले राजा को शत्रु नहीं मार (जीत) सकते हैं।
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