समानयानकर्मा च विपरीतस्तथैव च ।
तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिज्ञेयो द्विलक्षणः ।।
(१) समानकर्मा सन्धि और असमानकर्मा सन्धि । तात्कालिक या भविष्य के लाभ की इच्छा से किसी दूसरे राजा से मिलकर यान (शत्रु पर चढ़ाई) करना समानधर्मा नामक सन्धि है, तथा (२) तात्कालिक या भविष्य में लाभ की इच्छा से किसी राजा से आप इधर जाइये, में इधर जाता हूँ” ऐसा कहकर पृथक्पृथक् यान (शत्रु पर चढ़ाई) करना, 'असमानधर्मा' नामक सन्धि है।
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