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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 158
अनन्तरमरिं वद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम्‌ ।।
विजिगीषु (अपने राज्य के पार्श्ववर्ती) तथा शत्रु की सेवा करने वाला राजा 'अरि' अरि के बाद में रहने वाला 'मित्र' और उन दोनों से भिन्न राजा 'उदासीन' होता है।
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