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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 100
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्ध पात्रेषु निक्षिपेत्‌ ।।
(राजा) अप्राप्त (नहीं मिले हुए भूमि तथा सुवर्ण आदि) को पाने की इच्छा करे, प्राप्त (भूम्यादि) की यत्नपूर्वक रक्षा करे, रक्षा किये गये को बढ़ावे और बढ़ाये हुए (द्रव्य, भूमि आदि) को सत्पात्रों में दान कर दे।
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