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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 116
ग्रामदोषान्समुत्पन्नान्‌ ग्रामिकः शनकैः स्वयम्‌ । शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशोविंशतीशिने ।।
चोर आदि के उपद्रव को शान्त करने में असमर्थ एक गाँव का रक्षक दश गाँवों के रक्षक को, दश गाँवों का रक्षक बीस गाँवों के रक्षक को
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