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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 84
न स्कन्दति न च्यवते न विनश्यति कर्हिचित्‌ । वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम्‌ ।।
अग्नि में हवन किये हविष्य (क्षीरान्न, घृत आदि हवनीय पदार्थ) की अपेक्षा ब्राह्मण के मुख में किया गया हवन (ब्राह्मण को दिया गया दान) न भीक नीचे गिरता है, न कभी सूखता है और न कभी नष्ट होता है (अत: अग्नि होत्रादि कर्म की अपेक्षा ब्राह्मण को दान देना श्रेष्ठ है)।
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