भिन्दन्त्यवमता मन्त्र तैर्यग्योनास्तथैव च ।
स्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ।।
क्योंकि अपमानित, जड़, मूक और बहरे तथा तिर्यग्योनि में उत्पन्न तोता मैना आदि और विशेष कर स्त्रियाँ (अस्थिर बुद्धि होने के कारण) मन्त्र का भेदन (अन्यत्र प्रकाशन) कर देती हैं, इस कारण उसमें (उन्हें हटाने में) यत्नयुक्त होवे।
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