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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 201
उपजप्यानुपजपेद्रुद्धयेतैव च तत्कृतम्‌ । युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभी: ।।
(राजा) राज्याभिलाषी तथा भेद योग्य, शत्रु के दायादो को या मन्त्री सेनापति आदि प्रकृति को फोड़े (विजय होने पर राज्य आदि का लोभ देकर अपने पक्ष में करे), उस (शत्रु) के द्वारा किये ऐसे कार्य (भेद) को स्वयं मालूम करे और विजयाभिलाषी राजा निर्भय होकर शुभ मुहूर्त में शत्रु से युद्ध करे।
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