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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 169
एकाकिनश्चात्ययिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया । संहतस्य च मित्रेण द्विविधं यानमुच्यते ।।
यान के दो भेद होते हैं शत्रु के आपत्ति में फैंस जाने पर अकस्मात्‌ (एका-एक) समर्थ राजा का आक्रमण करना प्रथम “यान” है तथा स्वयं समर्थ न होने पर मित्र के साथ आक्रमण करना द्वितीय “यान' है।
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