गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः ।
अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ।।
राजा पहाड़ पर चढ़कर, या एकान्त प्रासाद महल में या निर्जन वन में दूसरे से आज्ञात होते हुए (मन्त्री के साथ) मन्त्रणा (पञ्चाङ्ग: मन्त्र का विचार) करे।
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