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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 128
यथाल्पाल्पमदन्त्याद्यं वार्योकोवत्सषट्पदाः । तथाल्पाल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाब्दिकः करः ।।
जिस प्रकार जोक, बछड़ा और भ्रमर थोड़े-थोड़े अपने-अपने खाद्य (क्रमश: रक्त, दूध और मधु) को ग्रहण करता है; उसी प्रकार राजा को प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ग्रहण करना चाहिये।
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