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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 219
उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्नशः । एतःयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्धये ।।
(राजा) उपेता (प्राप्तिकर्ता अर्थात्‌ अपने), उपेय (प्राप्ति करने योग्य अर्थात्‌ शत्रु) तथा परिपूर्ण सामादि सब उपाय - इन तीनों को अवलम्बन कर प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयत्न करे।
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