उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्नशः ।
एतःयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्धये ।।
(राजा) उपेता (प्राप्तिकर्ता अर्थात् अपने), उपेय (प्राप्ति करने योग्य अर्थात् शत्रु) तथा परिपूर्ण सामादि सब उपाय - इन तीनों को अवलम्बन कर प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयत्न करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।