यदि तत्रापि सम्पश्येद्दोषं संश्रयकारितम् ।
सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ।।
जब राजा उक्त प्रकार से (७।१७४-१७५) संश्रय करने पर भी दोष, अपनी कार्य सिद्धि का अभाव) देखे; तब निर्भय होकर उस (दुर्बल) अवस्था में भी पूरी शक्ति के साथ युद्ध करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।