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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 43
त्रैविद्ये भ्यस्त्रयीं विद्यात्‌ दण्डनीतिं च शाश्वतीम्‌ । आन्वीक्षिकी चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ।।
(राजा) त्रिवेदों के ज्ञाता विद्वानों से त्रयी विद्या, नित्य दण्डनीति विद्या, आन्वीक्षिकी विद्या और लोकव्यवहार से वार्ता विद्या को सीखे।
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