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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 216
क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि । परित्यजेज्रपो भूमिमात्मार्थमविचारयन्‌ ।।
(नीरोगता आदि गुणों से युक्त होने के कारण) कल्याणप्रद, (नदी, नहर, तडागादि होने से वृष्टि का अभाव होने पर भी) धान्य उत्पादन करनेवाली (अधिक घास आदि होने से) पशुओं की वृद्धि में सहायक भूमि को राजा आत्मरक्षा के लिए बिना विचार किये छोड़ दे।
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