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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 24
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन्सर्वसेतवः । सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात्‌ ।।
दण्ड के विभ्रम (अभाव या अनुचित प्रयोग) से सब वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि) दूषित (परस्री- सम्भोग से वर्णसङ्कर) हो जाँय, सब मर्यादाएँ (चतुर्वर्गफल प्राप्ति का कारणभूत नियम) छिन्न-भिन्न हो जायें और सब लोगों में (चोरी, डाका, व्यभिचार आदि से) क्षोभ उत्पन्न हो जाय।
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