त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
तथा युद्धयेत सम्पन्ना विजयेत रिपून्यथा ।।
(राजा) पूर्वोक्त तीनों (साम, दान और भेद) उपायों के साधक न होने पर ही सैन्यादि-शक्ति से संयुक्त होकर वैसा युद्ध करे, जिससे शत्रुओं को जीत लें। (क्योंकि विजय होने से राज्यलाभ तथा युद्ध में सामने मरने पर स्वर्गलाभ होता है । किंतु यदि निश्चित रूप से पराजय की सम्भावना हो तो युद्ध त्यागकर आत्मरक्षा करनी चाहिये वहाँ से हट जाना चाहिये, क्योंकि मरने पर मनुष्य कोई कार्यसाधन नहीं कर सकता, जिससे वह सुखी हो। इसी कारण मनु भगवान् ने आगे (७।२१३) आत्मरक्षा करने पर जोर दिया है)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।