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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 1
राजधर्मान्प्रिवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नपः । सम्भवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ।।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि मैं) राजा (अभिषिक्त नृपति) के आचार, उत्पत्ति और इस लोक तथा परलोक में होनेवाली उत्तम सफलता होवे ऐसे राजधर्म (दृष्टादृष्ट कर्तव्य) को कहूँगा।
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