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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 130
पञ्चाशभाग आदेयो राज्ञा पशुहिरण्ययोः । धान्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव वा ।।
राजा को पशु तथा सुवर्ण का कर (मूल धन से अधिक) का पचासवाँ भाग और धान्य का छठा, आठवाँ या बारहवाँ भाग (भूमि की श्रेष्ठता अर्थात्‌ उपजाऊपन एवं परिश्रम आदि का विचारकर) ग्रहण करना चाहिये।
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