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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 33
एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोज्छेनापि जीवतः । विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ।।
इस प्रकार व्यवहार न्याय से (दण्ड प्रयोग) करने वाले, शिलोज्छ (४।५ टिप्पणी) वृत्ति से भी जीविका करने वाले अर्थात्‌ ऐश्वर्यहीन भी राजा का यश पानी में तेल की बूँद के समान संसार में फैलता है।
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