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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 172
अर्थसम्पादनार्थ च पीड्यमानस्य शत्रुभिः । साधुषु व्यपदेशश्च द्विविधः संश्रयः स्मृतः ।।
संश्रय दो प्रकार का होता है - शत्रु से पीडित होते हुए आत्मरक्षार्थ किसी बलवान्‌ राजा का आश्रय लेना प्रथम 'संश्रय' तथा भविष्य में शत्रु से पीडित होने की आशंका से आत्मरक्षार्थ किसी बलवान्‌ राजा का आश्रय लेना द्वितीय 'संश्रय' है।
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