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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 223
परीक्षिताः स्त्रियश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः । वेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ।।
(गुप्तचरों के द्वारा) परीक्षित, (गुप्त शस्त्र रखने तथा विष-लिप्त भूषण आदि धारण करने की आशङ्का से) नियत वेष तथा भूषणों से अच्छी तरह शुद्ध (दोषरहित) स्त्रियाँ (परिचारिकायें अर्थात्‌ दासियाँ) चामर आदि से हवा करने, स्नान तथा पीने के लिए पानी देने और सुगन्धित धूप आदि करने से राजा की सेवा करे।
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