यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थ चैव विप्रेभ्यो दद्याद्धोगान्धनानि च ।।
राजा बहुत दक्षिणा वाले (अश्वमेध, विश्वजित् आदि) अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए ब्राह्मणों को (स्री, गृह, शय्या, वाहन आदि) भोग- साधक पदार्थ तथा धन देवे।
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