तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्धोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ।।
उस (दण्ड) के भय से स्थावर तथा जङ्गम सभी जीव (अपने-अपने) भोग (को भोगने) के लिए समर्थ होते हैं और अपने-अपने धर्म (राजनियम) से विचलित (भरष्ट) नहीं होते हैं।
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