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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 210
सह वाऽपि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः । मित्रं हिरण्यं भूमिं वा सम्पश्यंस्त्रिविधं फलम्‌ ।।
(विजिगीषु राजा पूर्वोक्त प्रकार से युद्ध करे) अथवा उसके साथ मित्रता कर उस शत्रु राजा द्वारा दिये गये सुवर्ण (रत्नादि सम्पत्ति) तथा राज्य की एक भाग भूमि-- इन तीन (मित्र, सुवर्ण तथा भूमि) को युद्ध यात्रा का फल मानकर यत्नपूर्वक उस राजा के साथ सन्धि करे।
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