जिस प्रकार शरीरधारियों के प्राण (भोजनादि के अभाव से) शरीर के क्षीण होने से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार राज्य के पीड़ित करने से राजाओं के भी प्राण (प्रकृति-कोप आदि से) नष्ट हो जाते हैं (अत: राजा का कर्तव्य है कि यथावत् राज्य की रक्षा करता रहे)।
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