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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 112
शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनं यथा । तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्‌ ।।
जिस प्रकार शरीरधारियों के प्राण (भोजनादि के अभाव से) शरीर के क्षीण होने से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार राज्य के पीड़ित करने से राजाओं के भी प्राण (प्रकृति-कोप आदि से) नष्ट हो जाते हैं (अत: राजा का कर्तव्य है कि यथावत्‌ राज्य की रक्षा करता रहे)।
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