तं राजा प्रणयन्सम्यकत्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामान्धो विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ।।
उस (दण्ड) का यथायोग्य प्रयोग करता हुआ राजा (या राज-नियुक्त पुरुष) त्रिवर्ग (अर्थ, धर्म और काम) से समृद्धियुक्त होता है (और इससे विपरीत) विषयाभिलाषी, क्रोधी, क्षुद्र (नीच स्वभाव होने से विना विचार किये दण्ड प्रयोग करनेवाला) राजा दण्ड के द्वारा ही मारा जाता है (अमात्यादि प्रकृति के कोप होने पर नष्ट हो जाता है)।
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