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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 17
स राजा पुरुषो दण्ड: स नेता शासिता च सः । चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ।।
वह दण्ड ही राजा है (क्योंकि दण्ड में ही राज करने की शक्ति है) वह दण्ड पुरुष (मर्द) है (और अन्य सभी लोग उस दण्ड के विधेय) (विनय ग्रहण में शासनीय) होने से स्त्री तुल्य हैं), वह दण्ड नेता है (उस दण्ड के द्वारा ही सब कार्य यथावत्‌ प्राप्त होते हैं; अत: वह नेता-- प्राप्त करानेवाला है), वह दण्ड शासन करनेवाला है (क्योंकि दण्ड की आज्ञा से ही सब अपने-अपने कर्म में संलग्न हैं) और वह दण्ड चारों आश्रमों (६।८७) के धर्म के प्रति (जामिन्दार, मध्यस्थ मनु आदि महर्षियों के द्वारा) कहा गया है।
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