भुक्तवान्विहरेच्चैव स्त्रीभिरन्तःपुरे सह।
विहृत्य तु यथाकालं पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ।।
भोजन कर राजा रनिवास में रानियों के साथ विहार (क्रीडा) आदि करे तथा यथासमय (दिन के सप्तम भाग में विहारकर) फिर (दिन के अष्टम भाग में) राजकार्यो का चिन्तन करे।
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