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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 221
तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रर्विषापहैः ।।
वहाँ (अन्तःपुर में) अपने तुल्य, भोजन-समय के ज्ञाता, किसी शत्रु आदि से फोड़कर अपने पक्ष में नहीं करने योग्य परिचारकों (पाचक आदि) से बनाये गये एवं परीक्षा किये गये अन्न आदि (भोज्य, पेय, लेह्य, चोष्य आदि पदार्थ) को विषनाशक मन्त्रं से (गारुडादि मंत्रों को जपकर) भोजन करे।
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