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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 170
क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात्पूर्वकृतेन वा । मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्‌ ।।
आसन के दो भेद हैं - भाग्यवश या पूर्वजन्म के कार्यवश सेना, कोष आदि के क्षीण हो जाने पर या समृद्ध रहने पर भी राजा का घेरे पड़े रहना प्रथम 'आसन' है तथा मित्र के अनुरोध से उसकी रक्षा के लिए शत्रु का घेरे पड़े रहना द्वितीय 'आसन' है।
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