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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 227
संध्यां चोपास्य श्ृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत्‌ । रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम्‌ ।।
(फिर राजा) सायङ्काल का सन्ध्योपासन करके दूसरी कक्षा (ड्योढ़ी) के भीतर एकान्त स्थान में स्वयं शस्त्र को धारणकर गुप्त समाचारों को बतलाने वाले गुप्तचरों के कामों को सुने और उसके बाद उन्हें विदाकर परिचारिकाओं (दासियों) से परिवृत होकर भोजन के लिए फिर अन्तःपुर में प्रवेश करे।
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