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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 53
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते । व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनो मृतः ।।
(व्यसन तथा मृत्यु-दोनों के कष्टकारक होने पर भी) मृत्यु को अपेक्षा व्यसन अधिक कष्टकारक है; क्योंकि मरा हुआ व्यसनी पुरुष नरकों में (एक के बाद दूसरे नरक में) जाता है और मरा हुआ व्यसन रहित पुरुष स्वर्ग में जाता है।
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