त्रीण्याद्यान्याश्रितास्त्वेषां मृगगर्ताश्रयाप्सराः ।
त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्गमनरामराः ।।
इन दुर्गो (७।७०) में से पहले वाले तीन दुर्गो में (धन्वदुर्ग, महीदुर्ग और जलदुर्ग में) मृग, विलों में रहनेवाले (चूहा, खरगोश आदि) तथा जलचर (मगर आदि) और अन्त वाले तीन दुर्गो में, (वृक्षदुर्ग, मनुष्यदुर्ग और गिरिदुर्ग मे) वानर, मनुष्य तथा अमर (देव) क्रमश: निवास करें।
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