तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूंषि च मनांसि च।
न चैनं भुवि शक्रोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ।।
यह. राजा देखने वालों के नेत्र तथा मन को सूर्य के समान संतप्त करता है। अतः पृथ्वी पर कोई भी इसे देखने में समर्थ नहीं होता।
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