पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्दधानतयैव च।
अल्पं वा बहु वा प्रेत्य दानस्य फलमश्नुते ।।
विद्या तथा तप से युक्त पात्र की अपेक्षा से (सुपात्र को प्राप्त कर) श्रद्धा से दिये गये दान के फल को परलोक में मनुष्य प्राप्त करता है।
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