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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 105
अमाययैव वर्तेत न कथञ्जन मायया । बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं सुसम्वृतः ।।
(राजा) सर्वदा (मन्त्री आदि के साथ) निष्कपट बर्ताव करे कपट से किसी प्रकार वर्ताव न करे (कपट वर्ताव करने से राजा सबका अविश्वासपात्र हो जाता है) और स्वयं सब व्यवहार को गुप्त रखता हुआ शत्रु के कपट को (गुप्तचरो के द्वारा) मालूम करे।
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