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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 192
यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्दलम्‌ । पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम्‌ ।।
(राजा) जिधर से भय की आशङ्का हो, उधर ही सेना का विस्तार करे और स्वयं सर्वदा “पद्मव्यूह’ से (नगर से निकलकर कपटपूर्वक) शत्रुदेश में प्रवेश करे।
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