शास्तरानुसार यथावत् विचार कर दिया गया दण्ड सब प्रजाओं को अनुरत करता है और बिना विचार किये धनलोभ या प्रमाद से दिया गया दण्ड सब तरफ से (धन-जन का) नाश करता है।
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