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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 85
सममब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे । आचार्ये शतसाहस्रमनन्तं वेदपारगे ।।
ब्राह्मणभिन्न (क्षत्रिय आदि) में दिया गया दान सामान्य फल वाला, ब्राह्मण क्रिया से रहित अपने को ब्राह्मण कहने वाले ब्राह्मण में दिया गया दान दुगुने फल वाला, विद्वान्‌ ब्राह्मण में दिया गया दान लाख गुने फल वाला और वेद-पारगामी ब्राह्मण में दिया गयां दान अनन्त फल वाला होता है।
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