सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्धोगाय कल्पते ।।
सब लोग दण्ड से जीते गये हैं (दण्ड के भय से ही नियमित होकर अपने-अपने कार्य में लगे हैं), (बिना दण्ड के) स्वभाव से ही शुद्ध मनुष्य दुर्लभ हैं दण्ड के भय से ही सम्पूर्ण संसार (अपने-अपने धनादि को) भोगने के लिए समर्थ होता है।
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