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मनुस्मृति • अध्याय 7 • श्लोक 212
हिरण्यभूमिसम्प्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते । यथा मत्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम्‌ ।।
राजा मित्र तथा राज्य की प्राप्ति वैसी उन्नति नहीं करता, जैसी वर्तमान में दुर्बल होने पर भी भविष्य में उन्नति करने वाले स्थायी मित्र की प्राप्ति से (उन्नति) करता है।
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