अध्याय 4 — चतुर्थ अध्याय
मनुस्मृति
263 श्लोक • केवल अनुवाद
ऋत्विक् (२।१४३), पुरोहित, आचार्य (२।१४०), मामा, अतिथि, आश्रित (भृत्यादि), बालक, वृद्ध, रोगी, वैद्य, जातिवाला, सम्बन्धी (जमाता, साला आदि), बान्धव (मातृपक्ष वाले)।
माता, पिता, जामि, (बहन, पुत्रवधू आदि कुलस्री), भाई, पुत्र, स्री, पुत्री, दास-समूह से विवाद (वाक्कलह, बकवाद आदि) न करे।
शय्या, घर, कुशा गन्ध (चन्दन, कर्पूर, कस्तूरी आदि), जल, फूल, मणि (रत्न-जवाहरात), दही, दाना (भूने हुए जौ या चावल), मछली, दूध, मांस और शाक; ये यदि बिना माँगे गृहपर दाता लावे तब इनको मना न करे (ले लेवे)।