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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 181
एतैर्विवादान्सन्त्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । एतैर्जितैश्च जयति सर्वाल्लोकानिमान्गृही ।।
इन (४।१७९-१८०) के साथ विवाद करना छोड़कर मनुष्य सब (अज्ञात) पापों से छूट जाता है और इन (विवादों) को जीतकर (इन विवादों को वश में करके अर्थात्‌ इनके साथ विवाद करना छोड़कर) गृहस्थ इन (४।१८२-१८४) सब लोकों को प्राप्त करता है।
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