इन (४।१७९-१८०) के साथ विवाद करना छोड़कर मनुष्य सब (अज्ञात) पापों से छूट जाता है और इन (विवादों) को जीतकर (इन विवादों को वश में करके अर्थात् इनके साथ विवाद करना छोड़कर) गृहस्थ इन (४।१८२-१८४) सब लोकों को प्राप्त करता है।
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