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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 141
'हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोतिगान्‌' । | रूपद्रविणहीनांश्न जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्‌ ।।
हीन (कम या अत्यन्त छोटे) अङ्ग वाले (यथा-- लङ्गड़ा, लूला, वामन आदि), अधिक अङ्ग वाले (यथा-- छाँगुर आदि), मूर्ख, बहुत अधिक उम्र वाले, कुरूप, निर्धन और नीच जाति वालों की निन्दा न करे (लंगड़ा, काना इत्यादि शब्द को उनके प्रति व्यवहार में न लावे)।
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