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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 176
परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । धर्म चाप्यसुखोदर्क लोकसंक्रुष्टमेव च ।।
जो अर्थ और काम धर्मविरुद्ध अर्थ (यथा - चोरी आदि के द्वारा धनसंग्रह करना, काम; यथा-- दीक्षा के दिन यजमान का स्त्रीसंभोग करना आदि) है, उनका त्याग करे, भविष्य में दु:ख देने वाले धर्मकार्य (यथा-- ख्रीपुत्रपौत्रादियुक्त पुरुष का सर्वस्व का दान देना आदि) का भी त्याग करे और लोकनिन्दित धर्मकार्य (यथा - कलियुग में अष्टकदि श्राद्ध में गोवधादि या नियोग (९।५९-६१) द्वारा सन्तानोत्पादन आदि) का भी त्याग करे।
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