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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 225
तान्‌ प्रजापतिराहैत्या मा कृढ्वं विषमं समम्‌ । श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत्‌ ।।
उन (देवताओं) के पास ब्रह्माजी आकर बोले कि विषम (अन्न) को समान मत करो (कृपया श्रोत्रिय तथा बहुत दानी सुदखोर के अन्न को बराबर मत कहो); किन्तु दान शील सूदखोर का अन्न श्रद्धा से पवित्र है तथा अन्य (कृपण अर्थात्‌ श्रद्धाहीन श्रोत्रिय का अन्न) अश्रद्धा से दूषित है । (अतः श्रद्धा से ही अन्नादि का दान करना श्रेष्ठ है)।
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