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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 240
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्‌ ।।
प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही पुण्य (जन्य स्वर्ग-आदि फल) भोगता है, और अकेला ही पाप जन्य (नरक आदि फल) को भोगता है।
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