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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 263
अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन्‌ वेदशास्त्रवित्‌ । व्यपेतकल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ।।
इस वृत्ति से आचरण करता हुआ, वेद-शांख का ज्ञाता ब्राह्मण पाप रहित होकर सर्वदा ब्रह्म में विलीन होकर उत्कृष्टता को प्राप्त करता है।
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