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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 237
यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्‌ । आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्तनात्‌ ।।
असत्य बोलने से यज्ञ नष्ट हो जाता है, विस्मय से तपस्या नष्ट हो जाती है, ब्राह्मण को दुर्वाच्य कहने से आयु और (दान दी हुई वस्तु को) कहने से दान (का फल) नष्ट हो जाता है।
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